- दिल्ली उच्च न्यायालय ने 29 मई 2026 को दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले में ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ (भूल जाने का अधिकार) को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आने वाले निजता के मौलिक अधिकार का हिस्सा माना है।
- 144 पृष्ठों के इस विस्तृत निर्णय में न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने कहा कि डिजिटल युग में किसी व्यक्ति की निजी जानकारी और उसकी प्रतिष्ठा की सुरक्षा भी संवैधानिक संरक्षण के दायरे में आती है।
- यह फैसला उन लोगों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जिनके खिलाफ दर्ज मामले समाप्त हो चुके हैं, आरोप हटाए जा चुके हैं या जिन्हें न्यायालय द्वारा बरी कर दिया गया है, लेकिन उनके नाम अब भी इंटरनेट और ऑनलाइन रिकॉर्ड में उपलब्ध हैं।
- न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के अतीत से जुड़ी जानकारी का अनिश्चित काल तक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रहना उसके सामाजिक, पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
- इसलिए उपयुक्त परिस्थितियों में व्यक्तियों को ऐसे पुराने डिजिटल रिकॉर्ड या खोज परिणामों को हटाने की मांग करने का अधिकार मिलना चाहिए। अदालत ने व्यक्तिगत सम्मान, गरिमा और प्रतिष्ठा को संविधान द्वारा संरक्षित मूलभूत मूल्यों में शामिल बताया।
- गौरतलब है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है।
- इसी अधिकार की व्यापक व्याख्या करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2017 में न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ मामले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया था।
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